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विरासत महोत्सव 2026 : लोकजीवन से शास्त्रीय कला तक, भारतीय संस्कृति का उत्सव

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गौतम चौधरी  देहरादून में 23 अक्टूबर से 6 नवंबर तक सजेगा कला, संगीत, साहित्य और शिल्प का पंद्रह दिवसीय महाकुंभ संस्कृति किसी समाज की स्मृतियों का संग्रह भर नहीं होती। वह उसके जीवन जीने के ढंग, उसकी संवेदनाओं, लोकविश्वासों, कलात्मक अभिव्यक्तियों और पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का जीवंत स्वरूप होती है। जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजता है, तब वह केवल अतीत को सुरक्षित नहीं करता, बल्कि भविष्य के लिए अपनी पहचान और संभावनाओं के द्वार भी खोलता है। देहरादून में आयोजित होने वाला विरासत महोत्सव इसी विचार को साकार करने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन है। उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में बसा देहरादून एक बार फिर भारतीय कला, संगीत, नृत्य, साहित्य और लोकपरंपराओं की विविध रंगत से सराबोर होने जा रहा है। 23 अक्टूबर से 6 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाला विरासत महोत्सव का 31वाँ संस्करण देश-विदेश के कलाकारों, शिल्पकारों, साहित्यप्रेमियों और संस्कृति के अनुरागियों को एक साझा मंच पर लाएगा। इस बार आयोजन का नया ठिकाना हिमालयन कल्चरल सेंटर, गढ़ी कैंट, देहरादून है। तीन दशक से अधिक समय से भारतीय सांस्...

कॉरपोरेट ताकत, सत्ता और जनहित की कसौटी

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  गौतम चौधरी लोकतंत्र में सत्ता केवल सरकार के हाथ में नहीं होती। आज सूचना, तकनीक और संचार पर नियंत्रण रखने वाली बड़ी निजी कंपनियाँ भी सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। इसलिए जब किसी कॉरपोरेट संस्था की भूमिका लोकतंत्र, सुरक्षा या राष्ट्रीय हित से जुड़े किसी संवेदनशील मामले में सामने आती है तो सवाल केवल उस कंपनी का नहीं रह जाता। सवाल यह होता है कि उसकी जवाबदेही किसके प्रति है और उसके निर्णयों की निगरानी कौन करेगा? इसी संदर्भ में दो अलग-अलग समय के दो मामले ध्यान खींचते हैं। पहला मामला 1997 का है, जब Tata Tea पर प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन ULFA से संपर्क और उसे सहायता देने के आरोप लगे थे। दूसरा वर्तमान का है, जब Tata Consultancy Services यानी TCS की भूमिका को लेकर मतदाता पंजीकरण के Form 6 में किए गए विवादित डिजिटल बदलावों पर सवाल उठ रहे हैं। दोनों मामलों को एक समान मानना तथ्यात्मक भूल होगी। दोनों की प्रकृति अलग है। फिर भी दोनों घटनाएँ एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न जरूर उठाती हैं— क्या संवेदनशील राष्ट्रीय संस्थाओं और प्रक्रियाओं में निजी कंपनियों की भूमिका इतनी पारदर्...

ईरान युद्ध : न तो वैश्विक दादागीरी की समर्थन किया जा सकता है और न ही धार्मिक अधिनायकवाद का

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गौतम चौधरी युद्ध अक्सर राजनीतिक बहसों, सैन्य रणनीतियों और शक्तिशाली नेताओं के उच्च महत्वाकांक्षा और उस पर आधारित आपसी विवाद से प्रारंभ होता है लेकिन उसका अंत हमेशा आम लोगों की भयंकर पीड़ा व त्रासदि पर जाकर समात्प होती है। ईरान बनाम इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि देशों के बीच होने वाले संघर्ष केवल सरकारों या सेनाओं तक सीमित नहीं रहते-वे आम लोगों के घरों, स्कूलों और सड़कों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ निर्दाेष जनता मारी जाती है। ऐसे समय में, जब दुनिया लगातार विभाजित होती दिख रही है, केवल भू-राजनीति की नहीं, मानवीय गरिमा, न्याय और शांति की तत्काल आवश्यकता पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। हालिया सैन्य कार्रवाइयों-विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध हमलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना को जन्म दिया है। कई वैश्विक नेताओं ने इस युद्ध की खुल कर आलोचना की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। यही नहीं उन नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘इस प्रकार की कार्रवाई क्षेत्रीय अस्थ...

इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता: सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग

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गौतम चौधरी भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में इस्लाम का लगभग एक जैसा ही स्वरूप देखने को मिलता है। हालांकि कुछ देशों ने आधुनिकता के साथ इस्लाम को जोड़ दिया है लेकिन डर वहां भी है। पुरातनपंथी वहां भी हावी है। इस्लाम में खास कर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर होने वाला बहस अक्सर रूढ़ियों, सांस्कृतिक आदतों और राजनीतिक शोर से प्रभावित रहती है। बहुत-से लोग यह नहीं जानते कि आधिक धर्म की वास्तव मर्यादा क्या है और वह क्या सिखाता है। इस्लाम में स्त्रिों के मामले में जब हम सीधे इस्लामी स्रोतों को देखते हैं, तो अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है - इस्लाम ने ऐसे समय में महिलाओं को मजबूत अधिकार दिए, जब उनके पास लगभग कोई अधिकार नहीं थे। क़ुरान के अवतरण के समय अरब समाज में महिलाओं को बहुत कम सुरक्षा प्राप्त थी। कुछ को विरासत से वंचित रखा जाता था, या संपत्ति की तरह माना जाता था। इस्लाम ने इन प्रथाओं को तोड़ते हुए यह सिखाया कि पुरुष और महिला एक ही आत्मा से उत्पन्न हुए हैं और आध्यात्मिक रूप से समान मूल्य रखते हैं। यही सिद्धांत पारिवारिक जीवन, शिक्षा और समाज में महिलाओं के अधिकारों की नींव बनी। विवाह के समय...

यह तो वक्त ही बताएगा कि पेसा कानून से झारखंड के आदिवासियों को फायदा हुआ या हानि

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गौतम चौधरी अंततोगत्वा हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार ने झारखंड में पेसा कानून लागू कर दिया। लागू कानून में कई विसंगतियां हो सकती है लेकिन इस कानून को अमली जामा पहनाने के लिए निःसंदेह हेमंत और उनकी सरकार धन्यवाद के पात्र हैं। हेमंत सोरेन की सरकार ने जिस पेसा को मान्यता दी है, उस पर कई सवाल खड़े किए जा रहा हैं। वर्तमान पेसा अधिसूचना की यदि खामियों पर प्रकाश डालें तो उसमें चार बड़ी विसंगतियां देखने को मिलती है। पहली विसंगति तो यह बताया जा रहा है कि पेसा नियमावली आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बना था। इसमें शिड्यूल्ड एरिया चिंहित करने की बात कही गयी थी। इसका चिंहिंकरण पारंपरिक आधार पर करना था और जहां पारंपरिक आधार काम नहीं कर रहा है वहां ग्राम सभा की समिति को करना था लेकिन सरकार ने नियमावली बनाते समय उसकी मूल भावना को ही खत्म कर दिया.है। अब शिड्यूल्ड एरिया उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति तय करेगी। हालांकि पेसा कानून की अधिसूचना में इस बात का साफ-साफ जिक्र नहीं किया गया है लेकिन यह जरूर बताया गया है कि आदिवासियों के गांवों का सीमांकन  उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति क...

रमजान का पाक महीना केवल उपवास व प्रार्थना का ही नहीं साम्प्रदायिक सदभाव का भी अवसर प्रदान करता है

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डॉ. रूबी खान   इस्लाम में सबसे पवित्र महीना रमज़ान सिर्फ़ उपवास और प्रार्थना का समय नहीं है, बल्कि यह सांप्रदायिक सद्भाव, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और साझा सांस्कृतिक विरासत के आदर्शों को खूबसूरती से दर्शाता है। दुनिया भर में लाखों मुसलमान इस पवित्र महीने में अपने धार्मिक कर्तव्यों का निर्वहण करते हैं। इस महीने में एकजुटता, करुणा और आपसी सम्मान की भावना धार्मिक और सांस्कृतिक सीमा को पार कर जाती है। इससे दुनियाभर में नए प्रकार की एकता और समझ विकसित होती है। रमज़ान मुख्य रूप से आत्म-अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक विकास का समय है। सुबह से शाम तक उपवास करने से वंचितों के प्रति सहानुभूति बढ़ती है। दान और उदारता के मूल्यों को बल मिलता है। परिवार, पड़ोसियों और यहाँ तक कि अजनबियों के साथ इफ्तार साझा करने का कार्य सामाजिक बंधन और सद्भाव को मजबूत करता है। इससे एक ऐसे माहौल का निर्माण होता है जो समाज में नयी उर्जा व समावेशिता पैदा करता है।  रमज़ान के दौरान ज़कात (दान) का अभ्यास सामाजिक एकजुटता को और बढ़ावा देता है। लोग धार्मिक संबद्धता की परवाह किए बिना ज़रूरतमंदों की भलाई में योगदान देते हैं। कम भाग...

चार भायतीय दिव्यांग मुस्लिम युवाओं की कहानी, जिन्होंने खेल के क्षेत्र में उदाअरण प्रस्तुत किया

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  डॉ. रूबी खान  सफलता की यात्रा अक्सर चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन पेरिस 2024 खेलों के लिए जा रहे चार भारतीय मुस्लिम पैरालिंपियनों के लिए चुनौतियां सिर्फ शारीरिक से कहीं अधिक थीं। अमीर अहमद भट, सकीना खातून, अरशद शेख और मोहम्मद यासर ने न केवल अपनी दिव्यांगताओं पर काबू पाया है, बल्कि अपनी पृष्ठभूमि के कारण उन पर रखी गई सामाजिक अपेक्षाओं पर भी उन्होंने काबू पाया है। ये एथलीट रोल मॉडल के रूप में खड़े हैं। खासकर मुस्लिम युवाओं के लिए, यह दर्शाते हुए कि कैसे कोई अपने देश को गौरवान्वित करने के लिए विपरीत परिस्थितियों से ऊपर उठ सकता है। कश्मीर की सुरम्य घाटियों से आने वाले आमिर अहमद भट, कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गए हैं। पी 3- मिश्रित 25 मीटर पिस्टल एसएच 1 श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने वाले एक पिस्टल शूटर, आमिर की पैरालिंपिक की यात्रा चुनौतिपूर्ण जीवन की एक अलग ही कहानी बया कर रही है। शारीरिक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, उनकी सटीकता और दृढ़ संकल्प ने उन्हें दुनिया के शीर्ष पैरा निशानेबाजों में शामिल कर दिया है। उन्होंने संघर्षग्रस्त क्षेत्र में रहने की प्रतिकूलताओं का सामना कि...