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गजवा-ए-हिंद की मूर्खतापूर्ण प्रचार से सावधान रहें भारतीय मुसलमान

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गौतम चौधरी  कुरान मजीद में लिखा है कि जो कोई एक भी निरपराध व्यक्ति की हत्या करता है, मानो उसने पूरी मानवता की हत्या कर दी हो और यदि एक व्यक्ति को भी बचाता है तो मानों उसने पूरी मानव जाति की रक्षा की है। कुरान किसी को भी बिना वजह मारने के खिलाफ है। पवित्र कुरान कभी निरपराध की हत्या का समर्थन नहीं करता है। लेकिन इस्लाम के नाम पर कई चरमपंथी और कट्टरपंथी, दशकों से यही कर रहे हैं। कुरान मजीद की वे गलत व्याख्या कर नहीं सकते इसलिए हदीस का सहारा लेते हैं गलत तर्जुमा कर नौजवानों को भड़काते हैं। इस प्रकार के आन्दोलन को हवा देने वाले इस्लाम की सच्ची तस्वीर को विकृत करने और अपने स्वयं के अहं को तुष्ट करने में लगे हैं। ऐसा ही एक संगठन भारत में भी अपना पांव पसार रहा है। इसे गजवा-ए हिंद के नाम से जाना जाता है। यह संगठन भारतीय उपमहाद्वीप के भोले-भाले मुस्लिम युवाओं को गुमराह करने के लिए गलत तरीके से हदीस की व्याख्या करने में लगे हैं। गजवा-ए हिंद का मोटे तौर पर भारत के खिलाफ पवित्र युद्ध के रूप में अनुवाद किया जा सकता है, जिसका उपयोग उसके समर्थकों द्वारा धोखे से मुसलमानों को भारत के खिलाफ क्रांति के...

कोरोना महामारी प्रतिबंधों और ईद-उल-अजहा का उत्सव

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रजनी राणा चैधरी ईद-उल-अजहा, विश्वव्यापी मनाया जाने वाला इस्लामी त्योहारों में से दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है। जमात-ए-इस्लामी हिंद की शरिया परिषद ने कोरोना महामारी के कारण सरकार द्वारा लगाए गए कई प्रतिबंधों के कारण, मुस्लिम समुदाय से ईद-उल-अजहा मनाने के कई दिशानिर्देश जारी किए हैं। हदीस का हवाला देते हुए, शरिया काउंसिल ने कहा है कि अल्लाह की नजर में कुरबानी सबसे पाक काम है और इसलिए मुसलमानों को ईद-उल-अजहा के त्योहार के मौके पर कुरबानी देने की कोशिश करनी चाहिए। काॅउंसिल ने कहा है कि जिन लोगों पर कुर्बानी अनिवार्य है,  उन्हें सरकारी प्रतिबंध और अन्य बाधाओं को ध्यान में रखते हुए अपने कुर्बानी को एक अलग जगह पर करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके अलावा, यदि उनकी कुर्बानी किसी दूसरी जगह पर करवाना संभव नहीं है, तो उन्हें त्योहार के बाद कुर्बानी के बराबर की राशि गरीबों को सदका (दान) के रूप में देना चाहिए। शरिया काउंसिल ने मुस्लिम समुदाय से आग्रह किया है कि वे दीन (धर्म) और शरिया (न्यायशास्त्र) के मार्गदर्शन और आज्ञाओं का पालन कानून की सीमाओं के भीतर रहकर करें और उन जानवरों की कुर्बानी स...

मनातू के मउआर को आप जानते हैं क्या?

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गौतम चौधरी  पहाड़, जंगल, गांव और समुद्री द्वीपों पर कुछ कहानियां यूं भटकती आत्मा की तरह घुमती रहती है। उन कहानियों में से कुछ भूत-प्रेत, डयन-चुड़ैल की कहानियां होती है, तो कुछ राजा-रानियों व जमीनदारों के रहस्य की कहानियां होती है। कुछ अधुरी प्रेम कहानियां भी होती है। उन कहानियों में झेपक और मिथक आदि की परंपरा अनादिकाल से चलती आ रही है। ये कहानियां नानी-दादी की जुवान से नई पीढी को हस्तांतरित होती है, या फिर गांव के किस्सागो उसे बड़े भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कहानियां समाज में लंबे समय तक अपना स्वरूप बदल-बदल कर जिंदा रहती है। कभी-कभी उन कहानियों के पात्र सजीव हो उठते हैं और लोगों के सामने आ जाता है। वह पल बड़ा रोचक होता है और रोमांचक भी होता है। उन पात्रों को देखना, उसे समझने की कोशिश करना अपने आप में अद्भुद होता है। कभी-कभी उन पात्रों के साथ कहानियां न्याय नहीं करती है क्योंकि उस पात्रों के उपर चिपका दिया गया अलंकार उसे वास्तविक स्वरूप में आने ही नहीं देता है। इस प्रकार के अलंकरण, कहानीकारों के पूर्वाग्रह का नतीजा होता है। मसलन कहानी गढ़ने वाले अपनी प्रतिभा और व्यक्...

नेतरहाट की मैगनोलिया की प्रेम कहानी आपने सुनी क्या

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गौतम चौधरी  मैगनोलिया की कहानी आपलोगों ने अगर नहीं सुनी होगी, तो मैं आपको सुनाता हूं! यह एक अधूरी प्रेम कहानी है। दरअसल, विगत दिनों मैं नेतरहाट गया था। उस नेतरहाटा को घुमने गया था जिसे छोटानागपुर की रानी के नाम से जाना जाता है। यह झारखंड का बेहद प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। नेतरहाट झारखंड में ही नहीं देश भर में प्रसिद्ध है। घनघोर जंगलों से आक्षादित, समुद्र तल से 3761 फीट की ऊंचाई पर स्थित नेतरहाट झारखंड का वह मनोरम स्थल है, जहां नैनाभिराम सूर्यास्त और सूर्योदय देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक जाते हैं। बड़ी संख्या में विदेशी, खासकर पश्चिमी देशों के पर्यटक भी यहां आते हैं क्योंकि नेतरहाट एक ब्रितानी लड़की की प्रेम कहानी से भी जुड़ी हुई है।  विगत दिनों में इंदिया गांधी राष्टÑीय कला केन्द्र की रांची शाखा के पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, आदिवासी आर्ट एंड हैंडिक्राप्त के कुछ विद्यार्थियों के साथ मैं नेतरहाट गया था। मेरे साथ इतिहास विषय में शोध कर रहे और सेंटर के अतिथि प्राध्यापक आदित्यनाथ झा भी साथ में थे। जैसे ही हमलोग बिशुनपुर से आगे बढ़े सर्पीले रास्ते ने हमारा मार्गदर्...

मुल्क की तरक्की के लिए दीनी शिक्षा ही नहीं आधुनिक इल्म भी जरूरी

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हसन जमालपुरी  अत्लाह के रसूल मोह्हमद और उनके साथियों ने खुद इम्लांम के प्रचार के लिए व्यापार और ज्ञान को प्राथमिकता दी थी। उन्होंने तालीम और व्यापार के माधयम से धर्म और धन दोनों हासिल किया, जिससे मजाब को भी काफी फायदा पहुंचाया। दुनिया में जितने भी मुल्क महाशक्ति बने हैं, वे सभी आज जिस मुकाम पर हैं, उसके पीछे कड़ा संघर्ष और त्याग ही है। भारतीय मुसलमानों को इस दिषा में तसल्ली से सोचने की जरूरत है क्योंकि हिन्दुस्तान जितना अन्य संप्रदाय के लोगों का है उससे कहीं अधिक हमारा भी है। इसलिए हमारी हिस्सेदारी हर जगह दिखनी चाहिए। मसलन हमें मदरसों पर भी ध्यान केन्द्रित करना हागा और वहां भी दीनी षिक्षा के साथ ही साथ आधुनिक शिक्षा जरूरी करना चाहिए।  हम यब वाकिफ है कि पाकिस्तान इतनी बुरी हालत तक केसे पहुँचा और बांग्लादेश खुद को इतने ऊँचे स्थान पर कैसे पहंुचाया। इसकी वजह ये है कि पाकिस्तान ने अपने युवाओं के हाथों में कलम के बजाय हथियार थमा दिया और साथ ही साथ धार्मिक अतिवाद को भी अपनी पहचान बना ली। इन्ही दो कारणों से आज पाकिस्तान तबाह हो रहा है, जबकि बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों ने अ...

प्रगतिशील उलेमाओं ने भारतीय मुस्लिम महिलाओं में नए दौर की सोच पैदा की

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कलीमुला खान  हर दौर में मजहब समाज को एक-दूसरे से जोड़कर रखने का जरिया रहा है। दौर-ए-जदीद में कोई उतार-चढ़ाव आए फिर-भी मजहब अपना एक अलग ही मुकाम है लेकिन यह भी सच्चाई है कि मजहब के नाम पर उठने वाले और तहरीके चलाने वालों में बहुत से ऐसे थे जिन्होंने या तो अपने मफादात यानी फायदे के खातिर जान-बूझकर मजहबी तालिमात को मनमाने ढंग से पेश किया और बड़ तादाद में सादा दिल अवाम उनका शिकार हुई लेकिन एक कीमती पहलू यह भी है कि ऐसी सूरत-ए-हाल का मुकाबला करने के लिए बड़े-बड़े विद्वान और उलेमा सामने आए और उन्होंने मजहबी तालिमात की असली हकीकत पेश की और आज यह सच्चाई समाज, इंसान और इंसानियत की तरक्की का सबब बनी हुई है। यह सबकुछ दिगर मजाहिब के साथ-साथ इस्लाम के मानने वालों में भी हुआ क्योंकि चूकि इस्लाम में कभी भी दौर-ए-जदीद के किसी भ्ज्ञी सही तरीके को नहीं नकारा और जब इस बात को सही तरीके से उलेमाओं व दानीश्वरों ने पेश किया तो इसका फायदा भी मिला और कुरान की असली तालिम को खुद मुस्लिम ख्वातीन भी काफी हद तक समझ चुकी है। अब तो खुद मर्द भी अपनी बहन बेटियों को उंची तालिम दिलाने में मददगार साबित हो रहे हैं। ...

यदि मैं कहूं कि बंगाल में मांशाहर की परंपरा से ज्यादा मजबूत परंपरा शाकाहार की रही है तो?

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गौतम चौधरी बंगाल का जहां कही नाम आता है तो मांशाहारी व्यंजनों की चर्चा जरूर होती है। खास का माछ-भात की चर्चा के बिना बंगाल की चर्चा अधूरी होती है लेकिन बंगाल में माशांहारी व्यंजनों के अलावा शाकाहारी व्यंजन भी बड़े चाव से पड़ोसे जाते हैं। आज हम बंगाल के शाकाहारी व्यंजनों पर प्रकाश डालने वाले हैं। तो आइए हम आपको बंगाल लिए चलते हैं जहां आपको निरामिष व्यंजन का स्वाद चखाएंगे! बंगाल कहने के लिए शाक्त संप्रदाय का केन्द्र है लेकिन यहां वैष्णव आन्दोलन का भी व्यापक प्रभाव रहा है। यही नहीं यहां वौद्ध और जैनियों के प्रभाव के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसलिए यदि यह कहा जाए कि बंगाल में केवल मांशाहारी व्यंजन का ही दबदबा रहा है यह सत्य नहीं है। मसलन बंगाल , बांग्ला और बंगाली का जिक्र आते ही एक चीज अपने आप जुड़ जाती है . बंगाल की संस्कृति का एक अहम हिस्सा मछली। मछली चावल या माछ - भात , फिश फ्राई या मछली के अंडों के पकौड़ों को बंगाल   का पर्याय मान लिया गया है।   बंगाल और मछली ...