ईरान युद्ध: न तो वैश्विक दादागीरी की समर्थन किया जा सकता है और न ही धार्मिक अधिनायकवाद का
गौतम चौधरी युद्ध अक्सर राजनीतिक बहसों, सैन्य रणनीतियों और शक्तिशाली नेताओं के उच्च महत्वाकांक्षा और उस पर आधारित आपसी विवाद से प्रारंभ होता है लेकिन उसका अंत हमेशा आम लोगों की भयंकर पीड़ा व त्रासदि पर जाकर समात्प होती है। ईरान बनाम इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि देशों के बीच होने वाले संघर्ष केवल सरकारों या सेनाओं तक सीमित नहीं रहते-वे आम लोगों के घरों, स्कूलों और सड़कों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ निर्दाेष जनता मारी जाती है। ऐसे समय में, जब दुनिया लगातार विभाजित होती दिख रही है, केवल भू-राजनीति की नहीं, मानवीय गरिमा, न्याय और शांति की तत्काल आवश्यकता पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। हालिया सैन्य कार्रवाइयों-विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध हमलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना को जन्म दिया है। कई वैश्विक नेताओं ने इस युद्ध की खुल कर आलोचना की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। यही नहीं उन नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘इस प्रकार की कार्रवाई क्षेत्रीय अस्थ...