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मदनी साहब का बयान भारत की समावेशी सांस्कृतिक परंपरा को मजबूत करने वाला साबित होगा

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गौतम चौधरी  अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन बलों के खिलाफ बीस साल की लड़ाई के बाद तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्जा करना सामान्य धारणा से परे है। घटनाक्रम इतना नाटकीय था कि हर कोई हैरान रह गया। हालांकि इसमें हैरानी की कोई बात नहीं थी। अफगानिस्तान की समसामयिक घटनाएं और मित्र राष्ट्रों की रणनीति यह बता रही थी कि आज नहीं तो कल तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा तय है। कई विश्लेषकों ने नए तालिबान को एक आधुनिक, परिष्कृत संस्करण के रूप में पेश किया है, जिसका पुराने तालिबान से बहुत कम संबंध है। हालांकि, वैचारिक प्रतिबद्धताओं और राजनीतिक ढांचे को सुव्यवस्थित करने में अनुमान से कहीं अधिक समय लगेगा। क्योंकि तालिबान ने अतीत में जो सख्ती की थी, उससे यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे पिछले 20 वर्षों में बदल गए हैं। इसके उदाहरण भी दिखने लगे हैं। लोग देश छोड़ने के लिए बेताब हैं, कुछ लोग राष्ट्रीय ध्वज के लिए लड़ने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। महिलाएं अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और बुरी तरह डरी हुई है। विदेशी सरकारें अपने राजनयिकों और दूतावास के कर्मचारियों के बाहर निकलने के जद्दोजहद में लगे हैं। ...

अमन पसंद लोगों का मजहब है इस्लाम, इसे बदनामी से बचाना है तो खालिस धार्मिक बने मुसलमान

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गौतम चौधरी   आतंकवाद एक जटिल विषय है। इसकी ठीक-ठीक परिभाषा आसान नहीं है। अमूमन लोगों के बीच आतंक पैदा करने वाले चिंतन को आतंकवाद कहते हैं। संभवतः इसकी विउत्पत्ति क्षद्म युद्ध से हुआ होगा। भारतीय चिंतन में क्षद्म युद्ध को कूट युद्ध भी कहा जाता है। यानी अपने प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने के लिए उनके उपर छुप कर हमला करना। इससे दुश्मनों के बीच आतंक फैल जाता है और उसका आत्मबल कमजोर पड़ जाता है। फिर दुश्मन पर आसानी से विजय प्राप्त किया जा सकता है। आतंकवाद से ही मिलता-जुलता शब्द उग्रवाद है।  आम तौर पर आतंकवाद और उग्रवाद में अंतर कर पाना आसान नहीं है लेकिन दोनों दो प्रकार की युद्ध कला है। यदि आप कहें कि उग्रवाद की ही अंतिम परिणति आतंकवाद है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आधुनिक समय में बड़े पैमाने पर आतंकवाद या उग्रवाद का दौर साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ देखने को मिलता है। थोड़ा पीछे जाने पर पता चलता है कि साम्राज्यवादी देश जब अपनी सत्ता मजबूत कर रहे थे तो उन्होंने स्थानीय लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए। इस अत्याचार के खिलाफ एक वैश्विक माहौल बना और उस माहौल को हवा देने में तत्कालीन सोव...

कश्मीरियों को संविधान सम्मत सारे अधिकार प्रदान हो लेकिन पृथक्तावादी मनोवृति पर भी लगाम जरूरी

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गौतम चौधरी  नई संवैधानिक व्यवस्था के बाद पहली बार केन्द्र सरकार ने बड़े पैमाने पर जम्मू-कश्मीर के स्थानीय नेताओं के साथ अभी हाल ही में एक बैठक संपन्न की है। वार्ता की बैठक में कश्मीर के हालिया स्थिति पर चर्चा के साथ ही साथ संभवतः इस विषय पर भी एक राय बनाने की कोशिश की गयी कि आने वाले समय में कश्मीर को लेकर जो भारत सरकार सोचती है, वही भविष्य की रणनीति भी होगी। वार्ता के कई पक्ष समाचार माध्यमों में सुर्खियां बटोरी। इस बैठक के बाद अखबारी व्याख्याकार और टिप्पणीकारों ने कश्मीर मामले पर बहुत कुछ लिखा और दिखाया है। कई लोगों ने केन्द्र सरकार एवं स्थानीय नेताओं के बीच की बैठक पर अपने मन्तव्य प्रस्तुत किए हैं। लिहाजा, बैठक की योजना सार्वजनिक होने से लेकर बैठक के बाद की स्थिति पर कई प्रश्न भी खड़े हुए हैं। सबसे पहला प्रश्न तो यही उठ रहा है कि आखिर इतने दिनों के बाद केन्द्र सरकार एकाएक बैठक की योजना क्यों बनाई? कुछ जानकारों ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि संभवतः केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जम्मू-कश्मीर में कुछ नयी व्यवस्था देने की सोच रही है। कुछ टिप्पणीकारों ने यह आशंका भी जता...

हमारे वर्तमान नेतृत्व में न तो सामूहिकता है न ही अनामिकता

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गौतम चौधरी  ‘‘निंदक नियरे राखिए ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।’’ आलोचना लोकतंत्र का श्रृंगार है। खासकर नेतृत्व को इसे केवल सकारात्मक ढंग से ही नहीं लेना चाहिए। इससे न केवल नेतृत्व को हानि  होती है अपितु परेशानी में फंसता है। दुनिया का इतिहास यही कहता है। भारत में राजतंत्रात्मक व्यवस्था में भी आलोचना का अपना अलग महत्व रहा है। राजा रावण को उसके छोटे भाई और लंका के महामंत्री विभीषण ने कहा था,  ’‘सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।’’ यानी जो सचिव, वैद्य और गुरू भय या किसी लालचवस क्रमशः अपने राजा, रोगी और शीष्य को कर्णप्रिय सलाह देता है तो उससे राज, शरीर एवं धर्म का जल्द से जल्द नाश हो जाता है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। हिटलर, मुसोलनी, जार निकोलस, लूई सोलहवां, रावण, कंश, जरासंध, दुर्योधन, मुहमद साह रंगीला, पृथ्वी राज चैहान आदि ऐसे राजा हुए हैं, जिन्होंने कर्णप्रिय सलाह के कारण अपना नाश तो कराया ही अपने राज और कौम का भी नाश करवा लिया।  मगध पर नियंत्रण के बाद महाराजा चन्द्रगुप्त मौय सैलुकस की की बेट...

धार्मिक साम्राज्य की तुलना में बहुधार्मिक लोकतांत्रिक राष्ट्र जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह

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कलीमुल्ला खान  इन दिनों पाकिस्तान में एक नया इस्लामिक धार्मिक आन्दोलन चल रहा है। इस आन्दोलन को चलाने वाले तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के नाम से पूरे पाकिस्तान में नई इस्लामिक आन्दोलन खड़ा करने की बात कर रहे हैं। वैसे पाकिस्तान को दुनिया भर में इस्लामिक राष्ट्र के रूप में पहचान मिली हुई है लेकिन पाकिस्तान के एक मौलवी, खादिम हुसैन रिजवी साहब ने इस आन्दोलन को प्रारंभ किया। रिजवी साहब का मानना है कि पाकिस्तान केवल कहने के लिए इस्लामिक राष्ट्र है, यहां इस्लाम के सही वसूल कायम नहीं हो पाए हैं और उनकी पार्टी की जब सरकार आएगी तो पाकिस्तान को सचमुच का इस्लामिक राष्ट्र बनाया जाएगा। वैसे रिजवी साहब की विगत दिनों रहस्यमय तरीके से मौत हो गयी। मौलाना रिजवी साहब की मौत में पाकिस्तानी गुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका बतायी जा रही है। रिजवी साहब की तहर ही पाकिस्तान के कई मौलवी समय समय पर अपने तरीके से इस्लाम को परिभाषित करते हैं और उसके आधार पर देश के प्रशासनिक ढ़ांचे को ढ़ालने की बात करते हैं। अफगानिस्तान में भी इसी प्रकार का एक आन्दोलन प्रारंभ हुआ, उसे तालिबान के नाम से जाना जाता है। तालिबानी लड़ाके जिसके...

पाकिस्तानी इस्लामिक परिभाषा और अत्याचार का शिकार रहा है बांग्लादेश

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रजनी राणा  पिछली सदी दक्षिण एशिया के इतिहास में सबसे हिंसक माना जना चाहिए। कई हिंसक टकरावों में से एक, 1971 का बांग्लादेश मुक्ति युद्ध है, जो एक सशस्त्र संघर्ष था। बांग्लादेश युद्ध, बंगाली राष्ट्रवादियों के उदय से शुरू हुआ था। यह मुक्ति संघर्ष बांग्लादेश के गठन तक चलता रहा। बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा था और बार-बार सैन तख्तापलत के कारण शोषण और दमन का शिकार होता रहा। जिसके परिणामस्वरूप 1971 और उसके आसपास बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ। यद्यपि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश को इस युद्ध से स्वतंत्रता मिली परन्तु इसके मानव जीवन के रूप में होने वाली छती की भरपाई करना संभव नहीं है। 25 मार्च 1971 की शाम को पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के खिलाफ पश्चिम पाकिस्तान में स्थित पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ी को ऑपरेशन सर्चलाइट के तहत राष्ट्रवादी बंगाली नागरिकों, बुद्धिजीवियों, छात्रों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और विभिन्न प्रसासनिक संस्था से जुड़े लोगों को विशेष रूप से पुलिस और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान राइफल्स के सैनिक बल और व्यक्तियों की हत्या को अंजाम दिया गया। ढाका एक ही शाम में मौत की घाटी में बदल गया। ...

दक्षिण एशिया के विकास में अहम भूमिका निभा रहा है भारत-बांग्लादेश दोस्ती

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गौतम चौधरी भारत हमेशा से अपने सभी पड़ोसियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध और सह अस्तित्व के सिद्धांत में विश्वास करता रहा है। हालांकि, हर किसी को खुश करना संभव नहीं है, खासकर तब जब पड़ोसी (पाकिस्तान) की रुचि अनैतिक और असामाजिक कार्यों में हो। पड़ोस में बसने वाले देशों में पाकिस्तान और चीन को छोड़ अन्य सभी के साथ बेहद मधुर संबंध हैं। खासकर बांग्लादेश उन पड़ोसी देशों में से है, जिसका संबंध अस्तित्व में आने के बाद से ही मधुर रहा है। हालांकि भारत के साथ बांग्लादेश का छोटा-मोटा विवाद भी चलता रहता है लेकिन दोनों देश के कूटनीतिक संबंध इतने बेहतर हैं कि उन विवादों का द्विपक्षीय संबंध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। बांग्लादेश और भारत समय-समय पर सामाजिक, सांस्कृतिक, सभ्यता और आर्थिक लिंक एक दूसरे के साथ साझा करते हैं। जानकारी में रहे कि बांग्लादेशी स्वतंत्रता संघर्ष को भारत ने समर्थन दिया था। यही नहीं भारत पहला देश था जिसने 1971 में बांग्लादेश को मान्यता दी और उसके साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। तब से बांग्लादेश, भारत को एक दोस्त, रक्षक और बाजार के रूप में देखता रहा है। बांग्लादेश के साथ बहुआयामी संबंधों क...