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राज्य और धर्म के बीच की जटिलता को संतुलित करने में अभूतपूर्व भूमिका निभा रहा है भारत

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डॉ. अनुभा खान  भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। भारत की एक विशेषता यह भी है कि यहां विभिन्न प्रकार की संस्कृति निवास करती है और भिन्न-भिन्न धार्मिक चिंतनों के कई मत-संप्रदाय विकसित हुए हैं। यही नहीं दुनिया के कुछ ऐसे मत-संप्रदाय के मानने वाले भी भारत में निवास करते हैं जिनका अन्य कहीं वजूद नहीं है और अन्य क्षेत्रों में बड़े सेमेटिक समूहों के हिंसा का शिकार भी होते रहे हैं। यहां ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि भारत के लोकतोंत्रिक व्यवस्था में धर्म और राज्य के बीच अनूठा संबंध है। यह संबंध कई मायनों में जटिल भी है। कई पश्चिमी देशों के विपरीत, जो अपनी सख्त परिभाषा के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का पालन करते हैं, वहां की तुलना में भारत का धर्मनिरपेक्षता के प्रति दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। जो इसकी समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को दर्शाता है। भारत में एक विविध धार्मिक परिदृश्य है, इसका संविधान स्पष्ट रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को अनिवार्य करता है, जो धर्म और सरकार के स्पष्ट पृथक्करण को दर्शाता है। लेख का उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता के प्रति भारत के अनूठे दृष्टिकोण की पेश क...

नए न्याय संहिताओं में सबका हित, मुसलमानों को देश के तंत्र में विश्वास बनाए रखने की जरूरत

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  हसन जमालपुरी अभी हाल ही में देश की कानून संहिताओं में व्यापक बदलाव किया गया। सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) सहित नए आपराधिक कानूनों को पूरे देश में लागू कर दिया। अब इन्ही तीनों सहिताओं के आधार पर आपराधिक प्राथमिकियां दर्ज की जाएगी साथ हमें इन्हीं संहिताओं के दायरे में न्याय भी प्राप्त होगा। मसलन, कानून की व्याख्याएं भी इन्हीं सहिताओं के दायरे में की जाएगी। हमारी सरकार ने दावा किया है कि ये कानून देश की कानूनी प्रणाली को आधुनिक बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं, जो क्रमशः औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे। इन सुधारों को कुछ लोगों द्वारा आवश्यक और लंबे समय से लंबित बताया जा रहा है, लेकिन इनसे महत्वपूर्ण बहस भी छिड़ गई है, खासकर भारत के मुस्लिम समुदाय पर उनके प्रभाव को लेकर। नए कानूनों के सबसे चर्चित पहलुओं में से एक है मॉब लिंचिंग के प्रति उनका दृष्टिकोण, एक ऐसा मुद्दा जिसने भारत में मुसलमानों को असंगत रूप से प्रभावित किया है। भारतीय न्यास स...

भारतीय कानून प्रणाली में नए बदलाव की सकारात्मकता को समझिए

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हसन जमालपुरी  भारतीय कानून प्रणाली में सुधार का संघर्ष निरंतर चल रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को न्याय पहुंचाना और कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार करना है। हाल ही में भारतीय संविधान में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं, जिन्होंने कानूनी प्रक्रियाओं में बदलाव लाने के साथ-साथ न्यायिक प्रणाली की दृष्टिकोण को भी समायोजित किया है। बीते एक जुलाई से बदले गए सारे कानून प्रभावी हो गए हैं। अब उन्हीं कानून के द्वारा हमें न्याय दिलाया जाएगा। या हम उन्हीं कानून के द्वारा न्यायालय में अपने लिए न्याय मांग सकते हैं। इसलिए इन कानूनों को जानना बेहद जरूरी है। सथ ही इसकी सकारात्मका पर भी गौर किया जाना चाहिए।  भारतीय कानून में किए गए कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों ने न्यायिक प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए हैं। ये संशोधन न केवल कानूनी प्रक्रियाओं को तेजी से और सुलभता से व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं, बल्कि न्याय पहुंचाने में भी सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते दिखते हैं।  सबसे पहले, संशोधन ने अपराधिक मामलों के न्याय दिलाने में समय सीमा को निर्धारित करने के प्रयास किए हैं। अब 35 धार...

पसमांदा आन्दोलन भारतीय मुसलमानों के अधिकारों का संरक्षक

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हसन जमालपुरी   आज के भारत में, पसमांदा आंदोलन हाशिए पर पड़े मुस्लिम समुदायों के अधिकारों और मान्यता की वकालत करने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है। इस्लाम की समानता की शिक्षाओं के बावजूद, भारतीय मुसलमानों के बीच जाति-आधारित भेदभाव विगत लंबे समय से कायम है। यह पसमांदा मुसलमानों के सामने आने वाली कठोर वास्तविकताओं को उजागर करता है। यह लेख जाति-आधारित भेदभाव को गहरा करने के मद्देनजर पसमांदा आंदोलन की बढ़ती प्रासंगिकता की पड़ताल करता है और हाल के उदाहरणों पर प्रकाश डालता है, जो इस कारण की तात्कालिकता को रेखांकित करते हैं।  फ़ारसी से व्युत्पन्न पसमांदा शब्द का अर्थ है, वे जो पीछे रह गए हैं। यह सामूहिक रूप से दलित, पिछड़े और आदिवासी मुसलमानों को संदर्भित करता है, जो मुस्लिम समुदाय के भीतर प्रणालीगत भेदभाव का शिकार हो रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय मुसलमानों को पदानुक्रमिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है, अशरफ (कुलीन या उच्च जाति के मुसलमान), अजलाफ (पिछड़े मुसलमान) और अरज़ल (दलित मुसलमान)। पसमांदा आंदोलन अजलाफ और अरज़ल मुसलमानों को ऊपर उठाने का एक सामाजिक आन्दोलन है।  भार...

उम्माह की अवधारणा को राजनीतिक रूप देना राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के खिलाफ

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हसन जमालपुरी   वैश्विक उम्माह की अवधारणा, मुसलमानों का विश्वव्यापी समुदाय जो अपने विश्वास के कारण एकजुट है, निःसंदेह मानवता के एक आदर्श तो जरूर है। हालांकि, आधुनिक युग में, राष्ट्र-राज्यों और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के प्रभुत्व ने, इस दृष्टिकोण के सामने चुनौती प्रस्तुत की है, बावजूद इसके यह आज भी दुनिया की मानवता के लिए उदाहरण है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य प्रणाली, जो 17वीं शताब्दी में वेस्टफेलिया की संधि के साथ उभरी, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय पहचान के सिद्धांतों पर जोर देती है। ये सिद्धांत अक्सर एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक समुदाय के विचार के साथ संघर्ष करता दिखता है। प्रत्येक राष्ट्र-राज्य के अपने कानून, रीति-रिवाज और हित होते हैं, जो धार्मिक एकजुटता को पीछे ढ़केलता दिखता है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति वैश्विक धार्मिक समुदाय के बजाय राज्य के प्रति अपनेपन और वफादारी की भावना को बढ़ावा देती है। कई लोगों के लिए, उनके राष्ट्र और उसकी संस्कृति से जुड़ी पहचान व्यापक धार्मिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, इस्लाम इस मामले को लेकर अंतरविरोध में रहा है।  यदि हम के मुस्लिम देश...

एएमयू की कुलपति के रूप में डॉ खातून की नियुक्ति के मायने

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डॉ. अनुभा खान  जैसे ही भारत के चुनाव आयोग ने 2024 के संसदीय आम चुनाव की घोषणा की संयुक्त राज्य अमेरिका से लेकर कई पश्चिमी देशों ने यहां के अल्पसंख्यकों की असुरक्षा को लेकर मनगढ़ंत आरोप लगाए। हालांकि नकारात्मक बाहरी शक्तियों का प्रभाव देश के आंतरिक भाग पर नहीं पड़ा लेकिन कोशिश लगातार जारी है। इस बीच अल्पसंख्यकों को लेकर भारत में कई प्रगति देखने को मिली है। उसमें से एक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में डॉ. नईमा खातून की नियुक्ति भी है। यह नियुक्ति भारतीय शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस नियुक्ति के साथ, डॉ. खातून विश्वविद्यालय के इतिहास में यह प्रतिष्ठित पद संभालने वाली पहली महिला बन गई हैं। यह उपलब्धि डॉ. खातून की शैक्षणिक उपलब्धियों और नेतृत्व गुणों का प्रमाण है और शैक्षणिक नेतृत्व में लैंगिक समानता प्राप्त करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम का भी द्योतक है।  पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्र में शीर्ष नेतृत्व की स्थिति में एक महिला के रूप में, डॉ. खातून की नियुक्ति उन युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अकादमिक करियर बनाने की इच्छा रखती हैं। यह पू...

तो क्या इस बार के संसदीय आम चुनाव को US लॉबी ने प्रभावित किया?

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गौतम चौधरी   अभी हाल ही में संपन्न संसदीय आम चुनाव का परिणाम आते ही प्रतिपक्ष, खास कर कांग्रेस नरेन्द्र मोदी पर हमलावर हो गयी। राहुल व प्रियंका सहित कई नेताओं ने नरेन्द्र मोदी को नैतिकता का पाठ पढ़ाया और यहां तक कह दिया कि उनको भारत की जनता ने नकार दिया है, इसलिए तुरंत प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए। हालांकि नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा इस बार भी उतनी सीट ले आयी, जितनी कांग्रेस को बीते तीन चुनाव जोड़ कर भी नहीं आयी है। इस बात का जिक्र खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में किया है। बावजूद इसके 2024 के संसदीय आम चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन निःसंदेह बढ़िया रहा है।  इस बार कांग्रेस को 2019 की तुलना में दोगुना के करीब सीटें आयी है। यह कांग्रेस का सराहनीय प्रदर्शन है, जबकि भाजपा की सीटें घटी है और 2019 की तुलना में भाजपा को 63 सीटों का नुकसान हुआ है। यदि प्रतिशत में बात करें तो 2019 की तुलना में इस बार भाजपा को 6 प्रतिशत वोट कम मिले हैं। सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का है। इसके पीछे के कई कारण हो सकते हैं लेकिन इस हार को ले...