श्राद्ध का स्वांग और कर्मकांडी ब्राह्मणों का पाखंड

गौतम चौधरी

2 अक्टूबर, 2013

आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से पूरा हिंदू समाज श्राद्धमय हो जाता है। हर हिंदू अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान करता है। हर कर्मकांडी पंडित इस महाअभियान में व्यस्त हो जाता है।

कर्मकांडी जमात का प्रचार है कि श्राद्ध के महीने में कालकवलित पितर अपनी संतति को आशीर्वाद देने मृत्युलोक आते हैं। ये अदृश्य प्राणी अपनी संतति को देखकर आनंदित होते हैं। जौ के आटे से बना पिंड प्राप्त कर फिर से पितृलोक प्रस्थान कर जाते हैं। इस मौसम में दान, यज्ञ, ब्राह्मण-भोजन आदि का बड़ा महत्व बताया जाता है। अपने पितरों को आनंदित करने के लिए कोई शय्या दान करता है तो कोई खाँटी पीतल की थाली दान कर देता है। मान्यता है कि यहाँ दान की गई वस्तुएँ विभिन्न लोकों में रहने वाले दानकर्ता के पितरों को प्राप्त होती हैं। आजकल कुछ लोग अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए आवश्यकता के आधुनिक संसाधनों का दान भी करने लगे हैं।

एक लाला जी ने अपने स्वर्गस्थ पिता को स्वर्ग में वाहन-सुख प्राप्त कराने के लिए पुरोहित को कार तक दान कर दी। हालाँकि कार चलाने के लिए उन्होंने चालक दान नहीं किया, लेकिन अपने स्वर्गस्थ पिताजी को वे अन्य आधुनिक संसाधनों का आनंद भी दिलाना चाहते हैं। सो, आने वाले समय में वे अपने पुरोहित को और उपयोगी वस्तुएँ प्रदान करेंगे। ऐसा उन्होंने मुझे स्वयं बताया।

दो दिनों पहले श्रीमद्भागवत कथा में कुछ महिला-पुरुष अंग्रेजी गाने पर भांगड़ा कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि कथा में उस दिन भगवान का जन्म हुआ था, इसलिए लोग आनंद मना रहे थे। विस्तार से पूछने पर सूचना देने वाले ने बताया कि मृत आत्मा को पितृलोक या अन्य दैवी लोकों में पहुँचाने के लिए भागवत की कथा सुनाई जाती है। यह सात दिनों तक चलती है। यही नहीं, उसने यह भी बताया कि यदि किसी को संतान नहीं हो रही हो तो हरिवंश पुराण की कथा कराने से संतान की प्राप्ति होती है।

विस्तार से तहकीकात करने पर पता चला कि इन दिनों कुछ लोग कर्मकांड को एक चिकित्सा-पद्धति बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं। कर्मकांड-पद्धति को मान्यता दिलाने के लिए न्यायालय जाने की तैयारी चल रही है। कुछ कर्मकांडपंथी इसे पूर्ण चिकित्सा-पद्धति की मान्यता दिलाने के लिए आंदोलन चलाने की तैयारी में हैं तो कुछ लोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से संपर्क कर रहे हैं। कर्मकांड-पद्धति को विशुद्ध और स्वतंत्र चिकित्सा-पद्धति की मान्यता दिलाने के लिए जनसंपर्क एजेंसियों से संपर्क साधा जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि कर्मकांड के द्वारा न केवल चिकित्सा की जा सकती है, अपितु इस कर्म-महाविज्ञान से जीवन की सारी समस्याओं का समाधान भी निकाला जा सकता है।

उधर, बिहार सरकार ने गया में पिंडदान करने वालों के लिए ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था कर दी है। गया में पंद्रह दिनों के भीतर करोड़ों का व्यापार होता है। गया के सामंती पंडा पालथी मारकर अपने यजमानों को सुफल प्रदान करते हैं। बेचारे सर्वहारा पंडितों को तो पाँच रुपये पर ही संतोष करना पड़ता है। कम ही लोगों को पता होगा कि गया के पंडा स्वयं पिंडदान नहीं कराते। वे यजमानों का हाथ बँधवाकर केवल पीठ ठोकते हैं और मुँहमाँगी दक्षिणा लेते हैं। चाहे वह प्रेतशिला हो या पुनपुन नदी, चाहे बोधगया हो या अंधकूप, अक्षयवट हो या फल्गु नदी—हर जगह मैथिल, कौचद्वीपी, शाकलद्वीपी, कान्यकुब्ज, सरयूपारीण आदि मूल के ब्राह्मण पिंडदान कराते हैं। यहाँ एक बात का उल्लेख कर देना उचित रहेगा कि पंडों की भूमिहार ब्राह्मणों और सामंती राजपूतों के साथ साँठगाँठ भी है, जो समय-समय पर पंडों को सामरिक सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं। गया की हर पिंडवेदी पर बस एक ही मंत्र गूँजता है—“पंचकोशे गया क्षेत्रे।”

पिंडदान के इस महाआडंबर वाले प्राचीन नगर गया का इतिहास जान लेना उचित रहेगा। कहा जाता है कि गया, गयासुर नामक राक्षस द्वारा बसाया गया नगर है। गयासुर न केवल प्रतापी राजा था, अपितु वह प्रजावत्सल भी था। उसके प्रभाव के कारण शोषणयुक्त संस्कृति का क्षरण होने लगा। गयासुर में एकमात्र कमी यह थी कि वह कर्मकांड का विरोधी था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने छल से उसकी हत्या कर दी। गयासुर की हत्या के बाद सामंती मनोवृत्ति वाले सामंतवादियों का गया पर फिर से कब्जा हो गया।

यह तो शास्त्रीय कथा है, पर वास्तविकता यह है कि गया भगवान बुद्ध के प्रभाव में आने के बाद कर्मकांड से मुक्त हो गया था। गया नगर वहाँ के राजा का पर्याय बन गया था। विष्णु नामक एक व्यापारी ने ब्राह्मण का स्वाँग रचकर राजा की हत्या करवा दी और पूरे गया पर कब्जा जमा लिया। उसी व्यापारी के वंशज आज गया पर राज कर रहे हैं तथा गया में किए जाने वाले पिंडदान और दान के भागीदार होते हैं। विष्णु नामक उसी व्यापारी के वंशजों को गयावाल पंडा कहा जाता है।

हालाँकि इस तथ्य का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन गयावालों के व्यवहार और मनोवृत्ति को देखकर इसे साबित किया जा सकता है। अन्य तीर्थों के पुरोहितों की तरह गयावालों का कोई उल्लेख शास्त्रों में नहीं मिलता है।

गयावालों का तर्क है कि भगवान विष्णु द्वारा किए गए यज्ञ का अंश कोई ब्राह्मण नहीं ले सकता था। तब भगवान विष्णु ने कुश को चीरकर उसमें से एक नए प्रकार के ब्राह्मण की रचना कर दी। इससे साफ जाहिर होता है कि गयावाल ब्राह्मणों के किसी कुनबे में शामिल नहीं हैं। फिर उन्हें दान लेने का प्रमाण किसी शास्त्र में भी नहीं मिलता है। ऐसे में न तो शास्त्रसम्मत दृष्टि से और न ही तर्क की कसौटी पर गया में पिंडदान का कोई औचित्य सिद्ध होता है।

शरीर पंचतत्त्वों से बना है। हर तत्त्व की अपनी प्रकृति है। आकाश तत्त्व जीवन की सक्रियता को प्रभावी बनाता है। मृत्यु के बाद हर तत्त्व अपने मूल तत्त्व में मिल जाता है। ऐसे में लोक-परलोक की कथा कोरी कल्पना है। यह पाखंड और व्यापार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। कर्मकांड मात्र शोषण का शास्त्र है। इसका कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसलिए पिंडदान और पितृपक्ष का कोई महत्व नहीं है।


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