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Showing posts from 2026

ईरान युद्ध : न तो वैश्विक दादागीरी की समर्थन किया जा सकता है और न ही धार्मिक अधिनायकवाद का

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गौतम चौधरी युद्ध अक्सर राजनीतिक बहसों, सैन्य रणनीतियों और शक्तिशाली नेताओं के उच्च महत्वाकांक्षा और उस पर आधारित आपसी विवाद से प्रारंभ होता है लेकिन उसका अंत हमेशा आम लोगों की भयंकर पीड़ा व त्रासदि पर जाकर समात्प होती है। ईरान बनाम इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि देशों के बीच होने वाले संघर्ष केवल सरकारों या सेनाओं तक सीमित नहीं रहते-वे आम लोगों के घरों, स्कूलों और सड़कों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ निर्दाेष जनता मारी जाती है। ऐसे समय में, जब दुनिया लगातार विभाजित होती दिख रही है, केवल भू-राजनीति की नहीं, मानवीय गरिमा, न्याय और शांति की तत्काल आवश्यकता पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। हालिया सैन्य कार्रवाइयों-विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध हमलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना को जन्म दिया है। कई वैश्विक नेताओं ने इस युद्ध की खुल कर आलोचना की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। यही नहीं उन नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘इस प्रकार की कार्रवाई क्षेत्रीय अस्थ...

इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता: सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग

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गौतम चौधरी भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में इस्लाम का लगभग एक जैसा ही स्वरूप देखने को मिलता है। हालांकि कुछ देशों ने आधुनिकता के साथ इस्लाम को जोड़ दिया है लेकिन डर वहां भी है। पुरातनपंथी वहां भी हावी है। इस्लाम में खास कर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर होने वाला बहस अक्सर रूढ़ियों, सांस्कृतिक आदतों और राजनीतिक शोर से प्रभावित रहती है। बहुत-से लोग यह नहीं जानते कि आधिक धर्म की वास्तव मर्यादा क्या है और वह क्या सिखाता है। इस्लाम में स्त्रिों के मामले में जब हम सीधे इस्लामी स्रोतों को देखते हैं, तो अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है - इस्लाम ने ऐसे समय में महिलाओं को मजबूत अधिकार दिए, जब उनके पास लगभग कोई अधिकार नहीं थे। क़ुरान के अवतरण के समय अरब समाज में महिलाओं को बहुत कम सुरक्षा प्राप्त थी। कुछ को विरासत से वंचित रखा जाता था, या संपत्ति की तरह माना जाता था। इस्लाम ने इन प्रथाओं को तोड़ते हुए यह सिखाया कि पुरुष और महिला एक ही आत्मा से उत्पन्न हुए हैं और आध्यात्मिक रूप से समान मूल्य रखते हैं। यही सिद्धांत पारिवारिक जीवन, शिक्षा और समाज में महिलाओं के अधिकारों की नींव बनी। विवाह के समय...

यह तो वक्त ही बताएगा कि पेसा कानून से झारखंड के आदिवासियों को फायदा हुआ या हानि

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गौतम चौधरी अंततोगत्वा हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार ने झारखंड में पेसा कानून लागू कर दिया। लागू कानून में कई विसंगतियां हो सकती है लेकिन इस कानून को अमली जामा पहनाने के लिए निःसंदेह हेमंत और उनकी सरकार धन्यवाद के पात्र हैं। हेमंत सोरेन की सरकार ने जिस पेसा को मान्यता दी है, उस पर कई सवाल खड़े किए जा रहा हैं। वर्तमान पेसा अधिसूचना की यदि खामियों पर प्रकाश डालें तो उसमें चार बड़ी विसंगतियां देखने को मिलती है। पहली विसंगति तो यह बताया जा रहा है कि पेसा नियमावली आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बना था। इसमें शिड्यूल्ड एरिया चिंहित करने की बात कही गयी थी। इसका चिंहिंकरण पारंपरिक आधार पर करना था और जहां पारंपरिक आधार काम नहीं कर रहा है वहां ग्राम सभा की समिति को करना था लेकिन सरकार ने नियमावली बनाते समय उसकी मूल भावना को ही खत्म कर दिया.है। अब शिड्यूल्ड एरिया उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति तय करेगी। हालांकि पेसा कानून की अधिसूचना में इस बात का साफ-साफ जिक्र नहीं किया गया है लेकिन यह जरूर बताया गया है कि आदिवासियों के गांवों का सीमांकन  उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति क...