इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता: सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग
गौतम चौधरी भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में इस्लाम का लगभग एक जैसा ही स्वरूप देखने को मिलता है। हालांकि कुछ देशों ने आधुनिकता के साथ इस्लाम को जोड़ दिया है लेकिन डर वहां भी है। पुरातनपंथी वहां भी हावी है। इस्लाम में खास कर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर होने वाला बहस अक्सर रूढ़ियों, सांस्कृतिक आदतों और राजनीतिक शोर से प्रभावित रहती है। बहुत-से लोग यह नहीं जानते कि आधिक धर्म की वास्तव मर्यादा क्या है और वह क्या सिखाता है। इस्लाम में स्त्रिों के मामले में जब हम सीधे इस्लामी स्रोतों को देखते हैं, तो अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है - इस्लाम ने ऐसे समय में महिलाओं को मजबूत अधिकार दिए, जब उनके पास लगभग कोई अधिकार नहीं थे। क़ुरान के अवतरण के समय अरब समाज में महिलाओं को बहुत कम सुरक्षा प्राप्त थी। कुछ को विरासत से वंचित रखा जाता था, या संपत्ति की तरह माना जाता था। इस्लाम ने इन प्रथाओं को तोड़ते हुए यह सिखाया कि पुरुष और महिला एक ही आत्मा से उत्पन्न हुए हैं और आध्यात्मिक रूप से समान मूल्य रखते हैं। यही सिद्धांत पारिवारिक जीवन, शिक्षा और समाज में महिलाओं के अधिकारों की नींव बनी। विवाह के समय...