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इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता: सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग

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गौतम चौधरी भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में इस्लाम का लगभग एक जैसा ही स्वरूप देखने को मिलता है। हालांकि कुछ देशों ने आधुनिकता के साथ इस्लाम को जोड़ दिया है लेकिन डर वहां भी है। पुरातनपंथी वहां भी हावी है। इस्लाम में खास कर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर होने वाला बहस अक्सर रूढ़ियों, सांस्कृतिक आदतों और राजनीतिक शोर से प्रभावित रहती है। बहुत-से लोग यह नहीं जानते कि आधिक धर्म की वास्तव मर्यादा क्या है और वह क्या सिखाता है। इस्लाम में स्त्रिों के मामले में जब हम सीधे इस्लामी स्रोतों को देखते हैं, तो अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है - इस्लाम ने ऐसे समय में महिलाओं को मजबूत अधिकार दिए, जब उनके पास लगभग कोई अधिकार नहीं थे। क़ुरान के अवतरण के समय अरब समाज में महिलाओं को बहुत कम सुरक्षा प्राप्त थी। कुछ को विरासत से वंचित रखा जाता था, या संपत्ति की तरह माना जाता था। इस्लाम ने इन प्रथाओं को तोड़ते हुए यह सिखाया कि पुरुष और महिला एक ही आत्मा से उत्पन्न हुए हैं और आध्यात्मिक रूप से समान मूल्य रखते हैं। यही सिद्धांत पारिवारिक जीवन, शिक्षा और समाज में महिलाओं के अधिकारों की नींव बनी। विवाह के समय...

यह तो वक्त ही बताएगा कि पेसा कानून से झारखंड के आदिवासियों को फायदा हुआ या हानि

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गौतम चौधरी अंततोगत्वा हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार ने झारखंड में पेसा कानून लागू कर दिया। लागू कानून में कई विसंगतियां हो सकती है लेकिन इस कानून को अमली जामा पहनाने के लिए निःसंदेह हेमंत और उनकी सरकार धन्यवाद के पात्र हैं। हेमंत सोरेन की सरकार ने जिस पेसा को मान्यता दी है, उस पर कई सवाल खड़े किए जा रहा हैं। वर्तमान पेसा अधिसूचना की यदि खामियों पर प्रकाश डालें तो उसमें चार बड़ी विसंगतियां देखने को मिलती है। पहली विसंगति तो यह बताया जा रहा है कि पेसा नियमावली आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बना था। इसमें शिड्यूल्ड एरिया चिंहित करने की बात कही गयी थी। इसका चिंहिंकरण पारंपरिक आधार पर करना था और जहां पारंपरिक आधार काम नहीं कर रहा है वहां ग्राम सभा की समिति को करना था लेकिन सरकार ने नियमावली बनाते समय उसकी मूल भावना को ही खत्म कर दिया.है। अब शिड्यूल्ड एरिया उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति तय करेगी। हालांकि पेसा कानून की अधिसूचना में इस बात का साफ-साफ जिक्र नहीं किया गया है लेकिन यह जरूर बताया गया है कि आदिवासियों के गांवों का सीमांकन  उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति क...

रमजान का पाक महीना केवल उपवास व प्रार्थना का ही नहीं साम्प्रदायिक सदभाव का भी अवसर प्रदान करता है

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डॉ. रूबी खान   इस्लाम में सबसे पवित्र महीना रमज़ान सिर्फ़ उपवास और प्रार्थना का समय नहीं है, बल्कि यह सांप्रदायिक सद्भाव, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और साझा सांस्कृतिक विरासत के आदर्शों को खूबसूरती से दर्शाता है। दुनिया भर में लाखों मुसलमान इस पवित्र महीने में अपने धार्मिक कर्तव्यों का निर्वहण करते हैं। इस महीने में एकजुटता, करुणा और आपसी सम्मान की भावना धार्मिक और सांस्कृतिक सीमा को पार कर जाती है। इससे दुनियाभर में नए प्रकार की एकता और समझ विकसित होती है। रमज़ान मुख्य रूप से आत्म-अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक विकास का समय है। सुबह से शाम तक उपवास करने से वंचितों के प्रति सहानुभूति बढ़ती है। दान और उदारता के मूल्यों को बल मिलता है। परिवार, पड़ोसियों और यहाँ तक कि अजनबियों के साथ इफ्तार साझा करने का कार्य सामाजिक बंधन और सद्भाव को मजबूत करता है। इससे एक ऐसे माहौल का निर्माण होता है जो समाज में नयी उर्जा व समावेशिता पैदा करता है।  रमज़ान के दौरान ज़कात (दान) का अभ्यास सामाजिक एकजुटता को और बढ़ावा देता है। लोग धार्मिक संबद्धता की परवाह किए बिना ज़रूरतमंदों की भलाई में योगदान देते हैं। कम भाग...

चार भायतीय दिव्यांग मुस्लिम युवाओं की कहानी, जिन्होंने खेल के क्षेत्र में उदाअरण प्रस्तुत किया

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  डॉ. रूबी खान  सफलता की यात्रा अक्सर चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन पेरिस 2024 खेलों के लिए जा रहे चार भारतीय मुस्लिम पैरालिंपियनों के लिए चुनौतियां सिर्फ शारीरिक से कहीं अधिक थीं। अमीर अहमद भट, सकीना खातून, अरशद शेख और मोहम्मद यासर ने न केवल अपनी दिव्यांगताओं पर काबू पाया है, बल्कि अपनी पृष्ठभूमि के कारण उन पर रखी गई सामाजिक अपेक्षाओं पर भी उन्होंने काबू पाया है। ये एथलीट रोल मॉडल के रूप में खड़े हैं। खासकर मुस्लिम युवाओं के लिए, यह दर्शाते हुए कि कैसे कोई अपने देश को गौरवान्वित करने के लिए विपरीत परिस्थितियों से ऊपर उठ सकता है। कश्मीर की सुरम्य घाटियों से आने वाले आमिर अहमद भट, कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गए हैं। पी 3- मिश्रित 25 मीटर पिस्टल एसएच 1 श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने वाले एक पिस्टल शूटर, आमिर की पैरालिंपिक की यात्रा चुनौतिपूर्ण जीवन की एक अलग ही कहानी बया कर रही है। शारीरिक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, उनकी सटीकता और दृढ़ संकल्प ने उन्हें दुनिया के शीर्ष पैरा निशानेबाजों में शामिल कर दिया है। उन्होंने संघर्षग्रस्त क्षेत्र में रहने की प्रतिकूलताओं का सामना कि...

सड़क पर प्रदर्शन और बेवजह विवाद इस्लामिक न्याय शास्त्र का अंग नहीं

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कलीमुल्ला खान  इस्लाम के पवित्र ग्रंथों में इस्लामि की शिक्षाएं न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उत्पीड़न का विरोध करने के विचारों पर दृढ़ता से आधारित हैं। लेकिन इन्हें सार्वजनिक व्यवस्था और शांति के मापदंडों के भीतर हर समय नियंत्रित रखना होगा। इस्लाम ऐसी किसी भी कार्रवाई को प्रतिबंधित करता है जो हिंसा को भड़काती है, या समाज में शांति को भंग करती है। इस्लामिक शिक्षाओं में सड़कों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन शामिल नहीं हैं जो दैनिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं और राज्य को कमजोर करता है।  अल-रयिहुरियाह, या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार, इसी तरह इस्लाम द्वारा बरकरार रखा गया है। यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है, लेकिन इसे सहिष्णुता, सामाजिक सद्भाव और आम भलाई को बढ़ावा देना चाहिए। कई इस्लामी विद्वान इस बात पर जोर देते हैं कि इस्लाम में, संचार का उपयोग लोगों के बीच घृणा, अमानवीयकरण या विभाजन को भड़काने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य समाज में सद्भाव और समझ लाना है। परामर्श का विचार भी मुसलमानों को अपने विचारों को इस तरह से व्यक्त करने में सक्षम बनाकर मुक्त भाषण क...

मुस्लिम महिलाओं को सरकार की विभिन्न योजनाओं तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है स्वयं सहायता समूह

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डॉ. रश्मि खान शाहनवाज  महिलाओं की आर्थिक स्थिति स्थापित करने और उनके समग्र सशक्तिकरण में योगदान देने के लिए कौशल विकसित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, स्वयं सहायता समूह यानी एसएचजी अक्सर कानूनी अधिकार और सरकारी मान्यता के आधार पर स्कूलों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों, स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों और कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, जिससे महिलाओं को महत्वपूर्ण ज्ञान व तकनीक तक पहुँच में सुविधा होती है। शिक्षा क्षेत्र में एसएचजी का उल्लेखनीय प्रभाव देखा गया है। जैसे-जैसे मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक स्थिति अधिक स्थिर होती जाती है, वे अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करते हैं, जिससे न केवल समाज और कौम का भला होता है अपितु देश भी विकास की ओर आपे-आप अग्रसर हो जाता है। यह योजना खासकर लड़कियों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है। अब मुस्लिम महिलाओं में भी लड़कियों को पढ़ाने की दिशा में जागरूकता बढ़ी है। इसका असर स्वास्थ्य और स्वतंत्रता, परिवार नियोजन और मातृ देखभाल जैसे विषयों पर व्यापक दिख रहा है। अब तक जो वर्ग हाशिए पर था वह एकाएक मुख्यधारा का आधार बनता जा रहा है।  एसएचजी का सबसे महत्वपूर्ण यो...

एक बार फिर USCIRF की बेबुनियात आलोचना का शिकार हुआ भारत

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  डॉ. हसन जमालपुरी भारत एक बार फिर, यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) की बेबुनियाद आलोचना का शिकार हुआ। इस बार, आयोग का दावा है कि भारत धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के लिए एक खतरनाक जगह बनता जा रहा है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय मुसलमानों ने ऐसा कहा, या फिर भारत की कोई मुस्लिम संस्था ने इस बात का दावा किया है? यूएससीआईआरएफ यह आरोप किस आधार पर लगाया है यह रहस्य बना हुआ है। भारत में रहने वाले और ज़मीनी हकीकत को जानने समझने वाले अच्छी तरह वाकफ हैं कि भारत अल्पसंख्यकों के मामले में बेहद संजीदा राष्ट्र है। यूएससीआईआरएफ हमारे देश की भयावह तस्वीर पेश करने पर आमादा हैं। सच तो यह है कि ये रिपोर्टें सिर्फ़ अनावश्यक शोर मचाने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। हो सकता है यह मामला हमारे राष्ट्र विरोधी ताकतों की करतूत भी हो। इस मामले से हमें सतर्क रहना चाहिए और समाज के युवकों को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। समुदाय को ऊपर उठाने के लिए काम करने के बजाय, ये तथाकथित ‘वॉचडॉग’ ऐसी कहानियां गढते और फैलाते हैं जो हमें प्रकारांतर में हानि पहुंचाता है। जब...